रोहिणी व्रत 2026 जैन धर्म की एक अत्यंत पवित्र और अनुशासनपूर्ण व्रत परंपरा है। यह व्रत विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु, पारिवारिक सुख और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए किया जाता है। हालांकि, इसका उद्देश्य केवल सांसारिक नहीं बल्कि कर्म क्षय और आत्मिक उन्नति भी है।
जैन पंचांग में नक्षत्रों का विशेष महत्व है और रोहिणी नक्षत्र को शुभता, वृद्धि और स्थिरता का प्रतीक माना गया है। इसी नक्षत्र के प्रभाव में किया गया यह व्रत जीवन के कष्टों और दरिद्रता से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
रोहिणी व्रत क्या है?
रोहिणी व्रत जैन धर्म में किया जाने वाला एक नक्षत्र-आधारित उपवास है, जो तब रखा जाता है जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान होता है। यह नक्षत्र जैन और हिंदू दोनों पंचांगों में 27 नक्षत्रों में से एक है।
मान्यता है कि रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में किया गया उपवास:
- पुराने कर्मों के बंधन को कमजोर करता है
- जीवन से दुःख और अभाव को दूर करता है
- वैवाहिक जीवन में स्थिरता और सौभाग्य बढ़ाता है
यह व्रत संयम, तप और आत्मनियंत्रण पर आधारित होता है, जो जैन दर्शन के मूल सिद्धांत हैं।
रोहिणी व्रत की तिथियाँ 2026
रोहिणी व्रत वर्ष में कुल 12 बार आता है, जब-जब रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय के बाद रहता है।
महत्वपूर्ण नियम:
- यदि रोहिणी नक्षत्र केवल रात में हो और सूर्योदय के बाद न रहे, तो उस दिन व्रत नहीं माना जाता।
- व्रत का पारण रोहिणी नक्षत्र समाप्त होने के बाद मृगशिरा नक्षत्र में किया जाता है।
2026 में रोहिणी व्रत की सटीक तिथियाँ जानने के लिए जैन पंचांग देखना अनिवार्य है, क्योंकि नक्षत्रों का समय चंद्र गणना पर निर्भर करता है।
जैन धर्म में रोहिणी व्रत का महत्व
जैन मान्यता के अनुसार रोहिणी नक्षत्र:
- पोषण और वृद्धि का प्रतीक है
- सकारात्मक कर्म फल को सक्रिय करता है
- गृहस्थ जीवन में संतुलन लाता है
इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से दरिद्रता, मानसिक क्लेश और पारिवारिक बाधाएँ दूर होती हैं। यही कारण है कि यह व्रत केवल एक दिन का उपवास न होकर दीर्घकालिक साधना माना जाता है।
रोहिणी व्रत की अवधि
रोहिणी व्रत को सामान्य रूप से एक-दो बार नहीं किया जाता, बल्कि इसे नियत अवधि तक लगातार करने की परंपरा है।
परंपरागत अवधि:
- 3 वर्ष
- 5 वर्ष
- 7 वर्ष
सबसे अधिक अनुशंसित अवधि:
5 वर्ष और 5 माह
यह अवधि धैर्य, श्रद्धा और निरंतर तप का प्रतीक मानी जाती है।
रोहिणी व्रत का उद्यापन
रोहिणी व्रत का समापन उद्यापन के बिना अधूरा माना जाता है।
उद्यापन में सामान्यतः शामिल होता है:
- दान और पुण्य कर्म
- साधु-संतों या जरूरतमंदों को भोजन
- जैन मंत्रों का जाप
- व्रत काल में प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति के लिए कृतज्ञता
उद्यापन व्रत का आध्यात्मिक पूर्ण विराम होता है।
रोहिणी व्रत की विधि और नियम
क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्यतः इसमें शामिल हैं:
- पूर्ण उपवास या सीमित आहार
- मौन और ध्यान
- जैन मंत्रों का स्मरण
- विलासिता और अनावश्यक सुख-सुविधाओं से दूरी
- करुणा और अहिंसा का पालन
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य बाहरी दिखावे से अधिक आंतरिक शुद्धि है।
रोहिणी व्रत 2026 केवल एक उपवास नहीं, बल्कि अनुशासन, श्रद्धा और आत्मिक शुद्धि की दीर्घ साधना है। जैन धर्म में इसका स्थान अत्यंत सम्मानित है और इसे नियमपूर्वक करने से जीवन में स्थिरता और शांति आती है।
यदि आप जैन व्रतों और पंचांग आधारित उपवासों को गहराई से समझना चाहते हैं, तो हमारा जैन व्रत एवं उपवास कैलेंडर अवश्य पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1.रोहिणी व्रत क्यों किया जाता है?
रोहिणी व्रत पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और कर्म क्षय के लिए किया जाता है।
2.रोहिणी व्रत साल में कितनी बार आता है?
यह व्रत साल में 12 बार आता है।
3.रोहिणी व्रत कब रखा जाता है?
जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान हो।
4.रोहिणी व्रत कितने वर्षों तक करना चाहिए?
सबसे उत्तम अवधि 5 वर्ष और 5 माह मानी गई है।
5.क्या उद्यापन जरूरी है?
हाँ, उद्यापन के बिना रोहिणी व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
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