आंध्र प्रदेश की शांत नल्लामलाई पहाड़ियों की गोद में बसा, श्रीशैलम का मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, भक्ति और स्थापत्य कला का एक अनूठा संगम है। यह पवित्र स्थल भगवान शिव और देवी पार्वती को समर्पित है, और इसकी गणना शिव के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों और देवी के बावन (या अठारह महा) शक्ति पीठों में की जाती है।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग शैव और शाक्त दोनों ही संप्रदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ भगवान शिव को मल्लिकार्जुन के रूप में पूजा जाता है, जो एक शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं, और उनकी सहचारिणी देवी पार्वती को भ्रामरम्बा के रूप में दर्शाया गया है। यह लेख इस पवित्र मंदिर के गहन इतिहास, धार्मिक महत्व और इसकी मनमोहक वास्तुकला की विस्तार से चर्चा करेगा, जो इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक बनाता है।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग श्रीशैलम: एक दोहरा तीर्थ स्थल
मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर, जिसे श्रीशैलम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित एक प्रमुख हिंदू मंदिर है. इसकी विशिष्ट विशेषता एक ही परिसर में ज्योतिर्लिंग और शक्ति पीठ दोनों की उपस्थिति है, जो भारत में एक दुर्लभ संयोग है. मंदिर परिसर दो हेक्टेयर में फैला हुआ है और इसमें चार भव्य प्रवेश द्वार, जिन्हें गोपुरम कहते हैं, मौजूद हैं.
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: महत्व और पौराणिक कथाएँ
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है, जिसका विस्तृत वर्णन शिव महापुराण में मिलता है. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, ज्योतिर्लिंग भगवान शिव को प्रकाश के एक विशाल स्तंभ के रूप में दर्शाता है, जो उनके अनंत और असीम स्वरूप का प्रतीक है. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भारत के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से दूसरा है.
एक कथा के अनुसार, भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच सृष्टि की सर्वोच्चता को लेकर विवाद हुआ था. उन्हें परखने के लिए, शिव एक अंतहीन प्रकाश स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, और उनसे इसके सिरों का पता लगाने को कहा. विष्णु ने विनम्रता से अपनी हार स्वीकार कर ली, जबकि ब्रह्मा ने झूठा दावा किया कि उन्होंने अंत ढूंढ लिया है. तब शिव प्रकाश के एक दूसरे स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, और ब्रह्मा को श्राप दिया कि उनकी किसी भी अनुष्ठान में पूजा नहीं की जाएगी, जबकि विष्णु की अनंत काल तक पूजा की जाएगी. जिन स्थानों पर इन प्रकाश स्तंभों के गिरने का विश्वास है, वहीं ज्योतिर्लिंग स्थित हैं.
एक और लोकप्रिय कथा भगवान शिव और पार्वती के अपने पुत्र कार्तिकेय की खोज की कहानी बताती है, जो गणेश के विवाह के बाद माउंट क्रौंचा चले गए थे. जब शिव और पार्वती उन्हें शांत करने पहुंचे, तो कार्तिकेय और दूर जाने का प्रयास करने लगे, लेकिन देवताओं के अनुरोध पर वे वहीं रुक गए. जिस स्थान पर शिव और पार्वती ठहरे, वह श्रीशैलम के नाम से जाना गया. ऐसा माना जाता है कि अमावस्या (अमावस्य) पर भगवान शिव अर्जुन के रूप में और पूर्णिमा (पूर्णिमा) पर देवी पार्वती मल्लिका के रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इसका नाम मल्लिकार्जुन पड़ा. एक अन्य कथा बताती है कि यहाँ के देवता की पूजा चमेली के फूलों (स्थानीय रूप से तेलुगु में ‘मल्लिका’ कहा जाता है) से की जाती थी, जिससे मल्लिकार्जुन नाम पड़ा.
भ्रामरम्बा शक्ति पीठ: देवी का दिव्य स्वरूप
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग परिसर के भीतर देवी भ्रामरम्बा का मंदिर भी है, जिसे बावन (या अठारह महा) शक्ति पीठों में से एक के रूप में पूजा जाता है. ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शिव सती देवी के निर्जीव शरीर को ले जा रहे थे, तो उनका ऊपरी होंठ (या गर्दन, कुछ स्रोतों के अनुसार) यहाँ गिरा था, जिससे यह स्थान एक महा शक्ति पीठ बन गया.
देवी भ्रामरम्बा, देवी पार्वती का ही एक अवतार हैं. एक कथा के अनुसार, अरुणासुर नामक एक राक्षस को ब्रह्मा से वरदान मिला था कि उसे कोई भी दो या चार पैरों वाला प्राणी नहीं मार सकता. उसके अत्याचारों से देवता परेशान हो गए और उन्होंने देवी दुर्गा से सहायता माँगी. देवी दुर्गा ने भ्रामरी या भ्रामरम्बिका का रूप धारण किया, और हजारों छह पैरों वाली मधुमक्खियाँ (bees) उत्पन्न कीं, जिन्होंने राक्षस का वध किया, क्योंकि उसके वरदान में वे शामिल नहीं थीं. जिस स्थान पर यह घटना घटित हुई मानी जाती है, उसे अब भ्रामरम्बा शक्ति पीठ के रूप में पूजा जाता है. कुछ भक्त आज भी मंदिर की ग्रेनाइट की दीवारों के भीतर से मधुमक्खियों की गूँज सुन सकते हैं. देवी की आठ भुजाओं वाली प्रतिमा है और उन्हें ब्राह्मणी शक्ति के रूप में पूजा जाता है.
श्रीशैलम मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और समृद्ध इतिहास
श्रीशैलम मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग उत्कृष्ट द्रविड़ वास्तुकला को प्रदर्शित करता है, जिसकी विशेषता इसके ऊँचे गोपुरम और विशाल प्रांगण हैं. इसे विजयनगर वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण माना जाता है. दो हेक्टेयर में फैला यह मंदिर परिसर 183 मीटर (600 फीट) लंबा, 152 मीटर (499 फीट) चौड़ा और 8.5 मीटर (28 फीट) ऊँची दीवारों से घिरा हुआ है. केंद्रीय मंडपम में कई खंभे और नंदीकेश्वर की एक विशाल प्रतिमा है. गर्भगृह की ओर जाने वाले मुखमंडपम में जटिल रूप से तराशे गए खंभे हैं.
इतिहास: सातवाहन वंश के शिलालेखों से मंदिर के दूसरी शताब्दी ईस्वी से अस्तित्व में होने की पुष्टि होती है. पहली शताब्दी ईस्वी में सातवाहन राजा वशिष्ठिपुत्र पुलुमावी के नासिक शिलालेख में भी श्रीशैलम मंदिर का उल्लेख है. मल्लिकार्जुन को रखने वाला गर्भगृह मंदिर का सबसे पुराना हिस्सा माना जाता है, जो 7वीं शताब्दी का है. अधिकांश आधुनिक निर्माण विजयनगर साम्राज्य के राजा हरिहर प्रथम (14वीं और 15वीं शताब्दी) के शासनकाल के दौरान हुए थे. वीरशेरोमंडपम और पातालगंगा की सीढ़ियों का निर्माण वन्नि रेड्डी साम्राज्य (12वीं और 13वीं शताब्दी) के दौरान किया गया था, जिनके शासक श्री भ्रामरम्भा मल्लिकार्जुन स्वामी के भक्त थे. दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी गोपुरम का निर्माण श्री कृष्णदेवराय द्वारा किया गया था, जबकि छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1677 में उत्तरी गोपुरम के निर्माण का आदेश दिया था. मंदिर में एक सहस्र लिंग (1000 लिंग) भी है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे भगवान राम ने स्थापित करवाया था, और पांच अन्य लिंगों को पांडवों द्वारा स्थापित माना जाता है.
यह मंदिर आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा बनाए रखा और प्रशासित किया जाता है.
श्रीशैलम यात्रा: दर्शन और अन्वेषण
श्रीशैलम की तीर्थयात्रा न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है, बल्कि इसकी प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करने का अवसर भी देती है. कृष्णा नदी को यहाँ पाताल गंगा के नाम से जाना जाता है, जहाँ 852 सीढ़ियाँ उतरकर पहुँचा जा सकता है, और इसके पवित्र जल का उपयोग शिव लिंग का अभिषेक करने के लिए किया जाता है.
अन्य दर्शनीय स्थल:
- शिखारेस्वरम मंदिर: मुख्य मंदिर के रास्ते में स्थित, ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के दर्शन से पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है.
- अक्कामहादेवी गुफाएँ: पातालगंगा से रोपवे और नाव की सवारी के माध्यम से यहाँ पहुँचा जा सकता है.
- श्रीशैलम बांध: कृष्णा नदी पर बना यह बांध दक्षिण भारत के सबसे बड़े बांधों में से एक है.
- नागार्जुनसागर-श्रीशैलम टाइगर रिजर्व: नल्लामलाई वन पारिस्थितिकी तंत्र में फैला भारत का सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य है.
- साक्षी गणपति मंदिर: एक और प्रमुख पूजा स्थल, श्रीशैलम जाने से पहले यहाँ जाना महत्वपूर्ण माना जाता है.
- ऑक्टोपस व्यूप्वाइंट: कृष्णा नदी और घने जंगल के मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है.
- पलाधारा पंचधारा: वह स्थान जहाँ आदि शंकराचार्य ने ध्यान किया था.
- हाटकेश्वरम: पलाधारा पंचधारा के पास एक और शिव मंदिर.
- कैलाश द्वारम: मंदिर तक ट्रेकिंग करने वालों के लिए मुख्य प्रवेश द्वार.
पहुँचने के साधन:
- हवाई मार्ग: सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा हैदराबाद में राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 195-237 किमी दूर) है. कुरनूल हवाई अड्डा (181 किमी) भी एक नज़दीकी घरेलू हवाई अड्डा है.
- रेल मार्ग: श्रीशैलम के लिए कोई सीधी रेल कनेक्टिविटी नहीं है, लेकिन सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन मार्कपुर रोड (85 किमी), कुम्बुम (60 किमी), नंद्याल (158-160 किमी) और कुरनूल (180-190 किमी) हैं. ये स्टेशन हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों से जुड़े हुए हैं.
- सड़क मार्ग: श्रीशैलम प्रमुख शहरों जैसे हैदराबाद (213-230 किमी), कुरनूल (180 किमी) और विजयवाड़ा (263 किमी) से बसों और टैक्सियों द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है. राज्य-संचालित (APSRTC) और निजी बस सेवाएँ उपलब्ध हैं.
ठहरने की व्यवस्था (Accommodation):
श्रीशैलम में ठहरने के विभिन्न विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें मंदिर समिति के कॉटेज और धर्मशालाएँ शामिल हैं. कुछ ज्ञात विकल्पों में मल्लिकार्जुन सदन, गंगा सदन, गौरी सदन, पुन्नामी गेस्ट हाउस, शिवा सदनम और विभिन्न निजी चोल्ट्री और लॉज शामिल हैं. गैर-एसी कमरों का किराया आमतौर पर ₹500–₹900 के बीच होता है, जबकि एसी कमरे ₹1000 से ₹1500 के बीच उपलब्ध हैं.
यात्रा के लिए सर्वोत्तम समय:
श्रीशैलम घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी तक है, जब मौसम सुहाना और तीर्थयात्रा व दर्शनीय स्थलों की यात्रा के लिए अनुकूल होता है. महाशिवरात्रि और नवरात्रि जैसे त्योहारों के दौरान यात्रा करने से एक अनूठा आध्यात्मिक अनुभव मिलता है, भले ही भीड़ अधिक हो.
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग, श्रीशैलम में स्थित, गहन आस्था, समृद्ध इतिहास और शानदार वास्तुकला का एक अद्वितीय प्रमाण है। यह पवित्र धाम, जहाँ भगवान शिव और देवी पार्वती दोनों की एक साथ पूजा होती है, भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों में एक अनूठा और शक्तिशाली स्थान रखता है।
श्रीशैलम का मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और आंतरिक ऊर्जा भी प्रदान करता है। यहाँ की यात्रा नल्लामलाई पहाड़ियों की प्राकृतिक भव्यता का भी गहन अनुभव कराती है। अपने अगले आध्यात्मिक खोज के लिए श्रीशैलम को अवश्य शामिल करें और इस दिव्य व मनमोहक अनुभव का आनंद लें।यदि आप शैव ज्योतिर्लिंगों के महत्व को और गहराई से समझना चाहें, तो यह विस्तार से लेख पढ़ सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग श्रीशैलम किस लिए प्रसिद्ध है?
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग श्रीशैलम भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और देवी पार्वती के बावन (या अठारह महा) शक्ति पीठों में से एक होने के कारण अत्यधिक प्रसिद्ध है, जो इसे एक दुर्लभ दोहरा तीर्थ स्थल बनाता है, इस मंदिर और इसके ऐतिहासिक विवरणों पर भरोसेमंद जानकारी के लिए यह मंदिर का पेज देखी जा सकती है।
2: श्रीशैलम में पाताल गंगा क्या है?
पाताल गंगा कृष्णा नदी के उस पवित्र हिस्से का नाम है जो श्रीशैलम में मंदिर के पास बहता है. यहाँ 852 सीढ़ियाँ उतरकर पहुँचा जा सकता है, जहाँ भक्त पवित्र डुबकी लगाते हैं और इसके जल का उपयोग शिवलिंग के अभिषेक के लिए किया जाता है.
3: श्रीशैलम मंदिर कितना पुराना है?
सातवाहन वंश के शिलालेखों से मंदिर के दूसरी शताब्दी ईस्वी से अस्तित्व में होने का संकेत मिलता है, जिसमें मल्लिकार्जुन गर्भगृह को सबसे पुराना हिस्सा माना जाता है, जो 7वीं शताब्दी का है.
4: मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की वास्तुकला शैली क्या है?
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग द्रविड़ वास्तुकला शैली में बना है, जिसमें ऊँचे गोपुरम, विशाल प्रांगण और जटिल नक्काशीदार संरचनाएँ हैं. इसे विजयनगर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है.
5: श्रीशैलम घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
श्रीशैलम घूमने का सबसे अच्छा समय सर्दियों के महीनों के दौरान, यानी अक्टूबर से फरवरी तक है, जब मौसम सुहाना और तीर्थयात्रा तथा आसपास के आकर्षणों को देखने के लिए आदर्श होता है.
महाकाल टाइम्स हिंदी – सोमनाथ मंदिर: इतिहास, ज्योतिर्लिंग महत्व और वास्तुकला गाइड
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