क्या आपने कभी सोचा है कि महाभारत के सबसे महान योद्धाओं में से एक, बाणों की शय्या पर पड़े-पड़े भी कई सप्ताह तक अपने प्राण क्यों नहीं त्यागे?
भीष्म अष्टमी उसी दिव्य क्षण की स्मृति है, जब पितामह भीष्म ने इच्छा मृत्यु के वरदान से युक्त होकर उत्तरायण के पुण्य काल में अपने शरीर का परित्याग किया।
यह पावन तिथि सोमवार, 26 जनवरी 2026 को माघ शुक्ल अष्टमी के दिन पड़ रही है। यह दिन धर्म, ब्रह्मचर्य, त्याग, संयम और सत्यनिष्ठा के शाश्वत आदर्शों की याद दिलाता है। इस लेख में हम भीष्म अष्टमी का अर्थ, पौराणिक संदर्भ, उत्तरायण का गूढ़ महत्व, प्रमुख अनुष्ठान और उज्जैन सहित विभिन्न क्षेत्रों में इसकी परंपराओं को विस्तार से समझेंगे।
भीष्म अष्टमी क्या है?
भीष्म अष्टमी, महाभारत के महान पात्र पितामह भीष्म की पुण्यतिथि है। उनका जन्म देवव्रत के रूप में हुआ था। राजा शांतनु और माता गंगा के पुत्र देवव्रत ने अपने पिता के सुख के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत लिया। इस भयंकर प्रतिज्ञा के कारण ही वे “भीष्म” कहलाए।
कुरुक्षेत्र युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के बाणों से घायल होने के बाद भीष्म पितामह तुरंत नहीं मरे। उन्होंने उत्तरायण के आरंभ की प्रतीक्षा की और माघ शुक्ल अष्टमी को अपनी इच्छा से देह त्याग किया। यही कारण है कि यह तिथि मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक मानी जाती है।
महाभारत में भीष्म का देह त्याग: पौराणिक संदर्भ
महाभारत के अनुसार, भीष्म पितामह लगभग 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर लेटे रहे। हिन्दू धर्म में दक्षिणायन (सूर्य का दक्षिण गमन) को देह त्याग के लिए अशुभ और उत्तरायण (उत्तर गमन) को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
भीष्म ने अपने योगबल और इच्छा मृत्यु के वरदान से मृत्यु को स्थगित रखा और उत्तरायण आने पर ही प्राण त्यागे। यह केवल मृत्यु नहीं थी, बल्कि धर्म और ब्रह्मज्ञान के साथ किया गया सचेत महाप्रस्थान था।
उत्तरायण और इच्छा मृत्यु का आध्यात्मिक अर्थ
उत्तरायण का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर यात्रा। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है कि उत्तरायण में देह त्याग करने वाले जीव उच्च लोकों को प्राप्त करते हैं।
इच्छा मृत्यु कोई साधारण वरदान नहीं है। यह इंद्रिय-विजय, संयम और आत्मज्ञान का चरम रूप है। भीष्म पितामह ने इस वरदान का उपयोग आत्मगौरव के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए किया।
भीष्म अष्टमी के प्रमुख अनुष्ठान और विधि
भीष्म अष्टमी पर दिखावे से अधिक श्रद्धा और शुद्ध भाव का महत्व होता है। प्रमुख परंपराएँ इस प्रकार हैं:
- पवित्र स्नान: प्रातःकाल गंगा, शिप्रा (उज्जैन) या किसी पवित्र नदी में स्नान।
- तर्पण एवं अर्घ्य: तिल, जौ और कुश के साथ सूर्य की ओर मुख करके जल अर्पण।
- एकोदिष्ट श्राद्ध: विशेष रूप से पितामह भीष्म के लिए किया जाने वाला श्राद्ध। यह पितृ दोष शांति और वंश वृद्धि के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
- व्रत: सामर्थ्य अनुसार उपवास, मौन और जप।
- मंत्र जप: अर्घ्य देते समय भीष्म स्तुति या पारंपरिक मंत्रों का उच्चारण।
इन सभी कर्मों को मध्याह्न काल में करना श्रेष्ठ माना गया है।
भीष्म अष्टमी 2026: उज्जैन में शुभ मुहूर्त
- तिथि: सोमवार, 26 जनवरी 2026
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 25 जनवरी 2026, रात 11:10 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 26 जनवरी 2026, रात 9:17 बजे
- मध्याह्न मुहूर्त: 11:33 AM से 1:46 PM
ये समय उज्जैन के स्थानीय पंचांग पर आधारित हैं।
भीष्म अष्टमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और आत्मसंयम की जीवंत शिक्षा है। पितामह भीष्म का जीवन और उनका उत्तरायण में किया गया देह त्याग हमें सिखाता है कि सच्चा बल शस्त्र में नहीं, बल्कि संयम और धर्म में होता है।
26 जनवरी 2026 को भीष्म अष्टमी का व्रत और श्राद्ध करके श्रद्धालु पितृ कृपा, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1.भीष्म अष्टमी 2026 कब है?
भीष्म अष्टमी 26 जनवरी 2026, सोमवार को माघ शुक्ल अष्टमी तिथि में है।
2.भीष्म ने उत्तरायण में ही देह त्याग क्यों किया?
क्योंकि उत्तरायण को मोक्ष प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ काल माना गया है।
3.एकोदिष्ट श्राद्ध कौन कर सकता है?
परंपरागत रूप से जिनके पिता दिवंगत हों, लेकिन आज सभी श्रद्धालु पितृ शांति हेतु कर सकते हैं।
4.क्या भीष्म अष्टमी पर उपवास आवश्यक है?
अनिवार्य नहीं, लेकिन व्रत और संयम को शुभ माना गया है।
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