महाकाल टाइम्स को गूगल पर एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में जोड़ें।
महाकाल टाइम्स - गूगल पर विश्वसनीय स्रोत

क्या आपने कभी यह सोचा है कि एक महावीर योद्धा की अडिग प्रतिज्ञा और उसके अंतिम क्षण कैसे युगों तक करोड़ों लोगों को धर्म, भक्ति और मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकते हैं?
यही भाव भीष्म द्वादशी का मूल है—एक ऐसा पावन व्रत, जो माघ शुक्ल द्वादशी को मनाया जाता है और जिसमें भीष्म पितामह के त्याग, संकल्प और धर्मनिष्ठ जीवन की स्मृति के साथ भगवान विष्णु (माधव/गोविंद) की उपासना की जाती है।

वर्ष 2026 में भीष्म द्वादशी गुरुवार, 29 जनवरी को उज्जैन में मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत पापों के नाश, धन-वैभव, नेतृत्व-सामर्थ्य तथा अंततः भगवान विष्णु के साथ एकत्व (मोक्ष) प्रदान करता है। इस लेख में आप भीष्म द्वादशी का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, शास्त्रीय आधार, सटीक तिथि-समय और नारद पुराण में वर्णित संपूर्ण पूजन विधि विस्तार से जानेंगे।

भीष्म द्वादशी 2026 के तिथि-समय (उज्जैन)

  • द्वादशी तिथि आरंभ: 29 जनवरी 2026, दोपहर 01:55 बजे
  • द्वादशी तिथि समाप्त: 30 जनवरी 2026, सुबह 11:09 बजे
  • पारण (व्रत तोड़ने का समय): 30 जनवरी 2026, सुबह 07:08 से 09:21 बजे तक

नोट: कुछ पंचांगों में पारण वाले दिन सूर्योदय से पहले द्वादशी समाप्त मानी जाती है। अतः स्थानीय पंचांग से पुष्टि करें। सभी समय उज्जैन स्थानीय समय के अनुसार हैं। पंचांग का दिन सूर्योदय से प्रारंभ और समाप्त माना जाता है।

भीष्म द्वादशी क्या है?

भीष्म द्वादशी माघ शुक्ल द्वादशी का पावन व्रत है, जो मुख्यतः भगवान विष्णु (माधव) को समर्पित है। शास्त्रों में इसे पाप-नाशक और मोक्ष-दायिनी तिथि कहा गया है। इसे संतान द्वादशी, वराह द्वादशी तथा कहीं-कहीं माधव द्वादशी भी कहा जाता है।

इस व्रत का नाम महाभारत के महान धर्मवीर भीष्म पितामह से जुड़ा है। उत्तरायण में स्वेच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त कर उन्होंने देह त्याग किया। मान्यता है कि पांडवों ने उनकी अंत्येष्टि इसी द्वादशी को की, इसलिए यह दिन पितृ तर्पण और पूर्वजों की शांति के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।

शास्त्रीय और ऐतिहासिक संदर्भ

निर्णय सिंधु ग्रंथ माघ शुक्ल द्वादशी को भीष्म द्वादशी बताता है और पद्म पुराण के आधार पर इसके पाप-नाशक प्रभाव का वर्णन करता है। अधिक पुण्य के लिए पूर्वविद्धा द्वादशी में व्रत करने की परंपरा कही गई है।

मत्स्य पुराण और पद्म पुराण में भीम/कल्याणिनी द्वादशी व्रत का उल्लेख है, जो दशमी से आरंभ होकर तीन दिन तक चलता है। नारद पुराण और भविष्य पुराण इस दिन भगवान माधव की उपासना पर विशेष बल देते हैं। यह द्वादशी जया एकादशी (भीष्म एकादशी) के बाद आती है, इसलिए कई साधक एकादशी से द्वादशी तक निरंतर व्रत रखते हैं।

आध्यात्मिक प्रतीक और अर्थ

भीष्म द्वादशी परम समर्पण, धर्म और वैराग्य का प्रतीक है। भीष्म पितामह का जीवन—ब्रह्मचर्य, सत्यनिष्ठा और स्वेच्छा-मृत्यु—यह सिखाता है कि धर्म के साथ लिया गया संकल्प मृत्यु-भय पर विजय दिलाता है।

इस दिन की उपासना विष्णु को सर्वभूतात्मा मानकर की जाती है, जिससे कर्मबंधन शिथिल होते हैं और साधक परम सत्ता के साथ एकत्व की अनुभूति करता है।

भीष्म द्वादशी व्रत की पूजन विधि

(नारद पुराण के अनुसार)

  1. प्रातः तैयारी: ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वेदी पर भगवान विष्णु/माधव की प्रतिमा स्थापित करें।
  2. व्रत: क्षमता अनुसार निर्जल, फलाहार या दुग्धाहार व्रत रखें।
  3. अभिषेक: भगवान माधव का एक सेर (लगभग 1 लीटर) दूध से अभिषेक करें।
  4. होम: अग्नि में आठ आहुतियाँ घी की दें और मंत्र जपें—
    “नमस्ते माधवाय”
  5. त्रिकाल पूजा और जागरण: चंदन, पुष्प और अक्षत से तीन बार पूजन करें तथा रात्रि जागरण रखें।
  6. पारण दिवस: प्रातः पुनः पूजा कर पारण की तैयारी करें।
  7. तिल-दान और दक्षिणा: ब्राह्मण को एक सेर तिल, वस्त्र और दक्षिणा इस मंत्र से अर्पित करें—माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः।
    तिलदानेन महता सर्वान् कामान् प्रयच्छतु॥
    (हे माधव! आप समस्त प्राणियों के आत्मा और कर्मफल दाता हैं। यह महान तिल-दान आपको प्रसन्न करे और सभी कामनाएँ पूर्ण हों।)
  8. पारण: ब्राह्मण-भोजन कराकर निर्धारित समय में व्रत तोड़ें।

नारद पुराण के अनुसार, इस व्रत का पुण्य सौ वाजपेय यज्ञों के तुल्य है।

भीष्म द्वादशी व्रत के लाभ

  • समस्त पापों का क्षय और कर्मबंधन से मुक्ति
  • धन, वैभव और नेतृत्व-शक्ति की प्राप्ति
  • जीवनांत में भगवान विष्णु से एकत्व (मोक्ष)
  • पितृ तर्पण हेतु अत्यंत फलदायी; पूर्वजों को शांति
  • धर्म में स्थिरता, आध्यात्मिक बल और मनःशांति

भीष्म द्वादशी 2026 हमें भीष्म पितामह की तरह त्याग, धर्म और समर्पण अपनाने की प्रेरणा देती है। नारद पुराण की विधि से व्रत करने पर अपार पुण्य, अंतःशांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

माघ मास की अन्य पावन तिथियों को जानने के लिए हमारा लेख पढ़ें—
जया एकादशी: विजय और भक्ति की एकादशी
श्रद्धा से व्रत करें—भगवान माधव आपको शाश्वत ज्ञान और समृद्धि प्रदान करें।

जय श्री विष्णु।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1.भीष्म द्वादशी 2026 कब है?

गुरुवार, 29 जनवरी 2026; पारण 30 जनवरी को है।

2.इसे भीष्म द्वादशी क्यों कहा जाता है?

क्योंकि इस दिन भीष्म पितामह की स्मृति में उनके अंतिम संस्कार किए गए माने जाते हैं।

3.क्या कोई भी यह व्रत कर सकता है?

हाँ, श्रद्धा से करने पर यह व्रत सभी साधकों के लिए फलदायी है।

4.क्या यह आमलकी द्वादशी के समान है?

नहीं। आमलकी एकादशी फाल्गुन में होती है; यह अलग व्रत है और माधव उपासना पर केंद्रित है।

5.मुख्य मंत्र कौन-से हैं?

“नमस्ते माधवाय” तथा तिल-दान मंत्र

 

प्राचीन इतिहाससांस्कृतिक दृष्टिकोणआध्यात्मिक यात्राओं और दुनियाभर की ताज़ा ख़बरों के लिए सबसे पहले विज़िट करें mahakaltimes.com/hi

महाकाल टाइम्स को अपने गूगल न्यूज़ फीड में जोड़ें।
Google News - महाकाल टाइम्स

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here